मणिपाल अस्पताल ईएम बाईपास और मुकुंदपुर क्लस्टर ने सात वर्षीय बच्चे को दुर्लभ और जानलेवा अग्न्याशय की चोट से समय पर ईआरसीपी प्रक्रिया द्वारा बचाया

देहरादून – 21 अगस्त 2025: ट्रॉमा और बाल गॅस्ट्रोएन्टेरोलॉजी के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए, मणिपाल अस्पताल ईएम बाईपास और मुकुंदपुर क्लस्टर के गैस्ट्रोएन्टेरोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. प्रदीप्त कुमार सेठी ने अपने विशेषज्ञ हस्तक्षेप से एक छोटे बच्चे की जान बचाई। यह बच्चा घर पर गंभीर और दुर्लभ अग्न्याशय की चोट का शिकार हो गया था। समय पर की गई जाँच और सटीक उपचार इस बच्चे की ज़िंदगी में निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

यह बच्चा, दीप अधिकारी (नाम बदला हुआ), उम्र ७ वर्ष, कोलाघाट, पूर्व मेदिनीपुर का निवासी और कक्षा १ का छात्र है। वह तब गंभीर रूप से घायल हो गया जब खेलते समय धातु की एक पुस्तक अलमारी उसके सीने और पेट पर गिर गई। पहले उसे एक स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, जहाँ प्रारंभिक रिपोर्ट में यकृत की चोट का अनुमान लगाया गया। लेकिन हालत की गंभीरता को देखते हुए उसे तुरंत उन्नत उपचार के लिए मणिपाल अस्पताल मुकुंदपुर भेजा गया।

अस्पताल में आगे की जाँच में पता चला कि मामला और भी जटिल है। उन्नत जाँच जैसे सीटी स्कैन और एमआरसीपी से यह स्पष्ट हुआ कि अग्न्याशय की नली पूरी तरह से फट चुकी थी। इसके कारण अग्न्याशय का रस आँत तक पहुँचने के बजाय पेट में जमा हो रहा था, जो बेहद खतरनाक है और संक्रमण, अंगों की क्षति तथा मृत्यु तक का कारण बन सकता है।

स्थिति की गंभीरता देखते हुए इस मामले को डॉ. प्रदीप्त कुमार सेठी के पास भेजा गया। उन्होंने सावधानी से विचार करने के बाद ईआरसीपी (एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड कोलांजियोपैंक्रियाटोग्राफी) द्वारा डक्ट में स्टेंट डालने का फ़ैसला लिया। यह अत्यंत जटिल लेकिन न्यूनतम कट-छाँट वाली प्रक्रिया है। बच्चे को मणिपाल अस्पताल मुकुंदपुर के बाल चिकित्सा आईसीयू में भर्ती किया गया। इस दौरान उनकी टीम के विशेषज्ञ डॉ. प्रसंता देबनाथ, डॉ. राहुल समंता और डॉ. पी कुमार ने पूरा सहयोग दिया।

डॉ. प्रदीप्त कुमार सेठी ने बताया, “बच्चों में अग्न्याशय की नली का फटना बेहद दुर्लभ है। शल्यचिकित्सा से स्थिति बिगड़ सकती है, जबकि केवल दवाइयों पर छोड़ देने से घातक जटिलताएँ हो सकती हैं। ऐसे में ईआरसीपी और स्टेंटिंग ही एकमात्र उपाय था। प्रक्रिया कठिन थी, लेकिन इससे बच्चे को जीवित रहने का सबसे अच्छा अवसर मिला। स्टेंट डालने से अग्न्याशय का रस पेट में रिसने के बजाय सीधे आँत में जाने लगा।”

ईआरसीपी के बाद बच्चे को बाल चिकित्सा आईसीयू में रखा गया, जहाँ डॉ. सौमेन मेउर (एचओडी व वरिष्ठ परामर्शदाता – बाल रोग) और डॉ. मनिदीपा दत्ता (परामर्शदाता – बाल रोग) ने देखभाल की। हालत बिगड़ने पर जब बच्चे का पेट फूलने लगा, तब डॉ. पार्थ प्रतिम सामुई (वरिष्ठ परामर्शदाता व इंचार्ज, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी, मणिपाल अस्पताल मुकुंदपुर) ने पिगटेल कैथेटर डालकर लगभग ८०० मिलीलीटर तरल बाहर निकाला, जिससे तुरंत राहत मिली।

सुधार की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण रही। मुँह से खिलाने की कोशिशें बार-बार असफल हुईं और पेट में सूजन व दर्द बढ़ गया। तब टीम में शामिल डॉ. भास्वती चक्रवर्ती आचार्य (वरिष्ठ परामर्शदाता – बाल गॅस्ट्रोएन्टेरोलॉजी) ने शिरा के माध्यम से पोषण देना शुरू किया। लगभग २० दिन बाद बच्चा धीरे-धीरे मुँह से खाना खाने लगा। एक महीने से अधिक गहन चिकित्सा के बाद उसे स्थिर स्थिति में छुट्टी दे दी गई। इस दौरान डॉ. अमिय कुमार मिश्रा (वरिष्ठ परामर्शदाता – एनेस्थेसियोलॉजी, मणिपाल ईएम बाईपास) और उनकी टीम ने विशेष विशेषज्ञता प्रदान की।

बच्चे के पिता, राजशेखर अधिकारी (नाम बदला हुआ) ने बताया, “इस साल १ मई को जब भारी पुस्तक अलमारी मेरे बेटे पर गिरा, हमारी ज़िंदगी बदल गई। हम पहले उसे नज़दीकी नर्सिंग होम ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि हालत गंभीर है और तुरंत कोलकाता ले जाना होगा। उसी दिन हम मणिपाल अस्पताल पहुँचे। ३ मई को डॉ. प्रदीप्त कुमार सेठी ने ईआरसीपी करके स्टेंट डाला। जून में बेटे को छुट्टी मिली। ४ अगस्त को स्टेंट सफलतापूर्वक निकाल दिया गया। आज वह कक्षा १ में पढ़ता है। अभी कुछ खानपान की पाबंदियाँ हैं, लेकिन वह जीवित है और सुरक्षित है, यही हमारे लिए सबसे बड़ी राहत है। मैं डॉक्टरों और अस्पताल का जितना धन्यवाद करूँ, कम है। उन्होंने मेरे बेटे को नई ज़िंदगी दी।”

इस सफल परिणाम ने यह साबित कर दिया कि मणिपाल अस्पताल, कोलकाता की विशेषज्ञता और उन्नत सुविधाएँ सबसे कठिन स्थितियों में भी जीवन बचाने में सक्षम हैं। यह मामला केवल ईआरसीपी और स्टेंटिंग की जीवनरक्षक भूमिका ही नहीं दिखाता, बल्कि गैस्ट्रोएन्टेरोलॉजी, बाल चिकित्सा गहन देखभाल, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी और बाल गॅस्ट्रोएन्टेरोलॉजी विभागों के अद्भुत समन्वय को भी उजागर करता है।

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